उम्मीद
तन्हा तन्हा यह जिन्दगी बेतरतीब गुजर ही जाएगी
यादों की माला टूट कर हाथों से बिखर जाएगी
अपनी नज्मों गजलों की फिक्र तुम करते हो क्योंकर
गैरों की कहे कौन, धीरसे अपनो से बिसर जायेगी
इक उम्मीद थी कि उम्मीद पे है ये दुनिया कायम
इस बेकार की उम्मीद से उम्मीद लगा बैठे हम
यूँ तो मैने हर उम्मीद से कर लिया किनारा लेकिन
किस उम्मीद पे कटे शामोसहर हो जीना मुमकिन
मैने हर शब जाम मे डुबोया था खुद को इस कदर
कि शब नाउम्मीदी मे न कटे, फलक से आये सहर
मुझे रात की कालिख से डर बिल्कुल नहीं लगता
बैठा हूँ कश्ती में किनारों पर है अब मेरी नज़र
शरद कुमार श्रीवास्तव
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