मंगलवार, 27 दिसंबर 2016


उम्मीद तन्हा तन्हा यह जिन्दगी बेतरतीब गुजर ही जाएगी यादों की माला टूट कर हाथों से बिखर जाएगी अपनी नज्मों गजलों की फिक्र तुम करते हो क्योंकर गैरों की कहे कौन, धीरसे अपनो से बिसर जायेगी इक उम्मीद थी कि उम्मीद पे है ये दुनिया कायम इस बेकार की उम्मीद से उम्मीद लगा बैठे हम यूँ तो मैने हर उम्मीद से कर लिया किनारा लेकिन किस उम्मीद पे कटे शामोसहर हो जीना मुमकिन मैने हर शब जाम मे डुबोया था खुद को इस कदर कि शब नाउम्मीदी मे न कटे, फलक से आये सहर मुझे रात की कालिख से डर बिल्कुल नहीं लगता बैठा हूँ कश्ती में किनारों पर है अब मेरी नज़र शरद कुमार श्रीवास्तव

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