सोमवार, 5 दिसंबर 2016

कविता

पाती 

यादो के समुन्दर मे लहरे गिरती पड़ती रहती 
कोई तसवीर मुक्कम्मल नहीं रह पाती उसमे
रेत के टीले बनते बिगडते यादों के मरुथल मे
प्यार के हरियाली भरे वे बाग संजो नहीं पाते

बक्से के कोने मे पडी तेरे हाथ से लिखी पाती
पीली पड़ गई है पर बक्से के बाहर नही जाती
लिपटी तेरे प्यार के फूलो की महकती गंध मे
फुसला के ले जाती  भूले हुऐ सुहाने मंजर तक

उन लमहों, उन पलों तक जो न वापस होंगे
ले जाती है तेरी सौगात तेरी चिट्ठी मुझको
हाले दिल बयाँ कर जो पाती मे लिख भेजा था
एहतियातों से संजोया है तेरा दस्तावेज बहोत

दिल की बात दिल के कोने मे उठती फिर भी
सिर्फ पाती है कभी तुझ सी हो नहीं सकती
सागर के मोतियों सी उज्जवल  तेरी वो याद
आँखों की सीपियों मे संजोये रखता है ये मन
रचना 

शरद कुमार श्रीवास्तव

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें