गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

शरारा तपिश तपिश ये खलिश खलिश हर पल तेरा ही खयाल है तेरी जुस्तजू इस कदर बढीं, गया दिल ,न कुछ मलाल है मेरा शौक तपिश मे जलना है मुझे आतिशों पे मचलना है बस शरारे यों ही उठे सदा तेरी आशिकी मे मुझे जलना है मेरी बन्दगी है न ये दिल्लगी, मेरे दिल मे लौ है लगी लगी हर साँस तेरा ही बस नाम ले, हर पल करूं मैं तेरी बन्दगी मेरी खाक हवा मे उड़े तो क्या ,ये तपिश फिजा मे बनी रहे मेरी रूह जिस्म से जुदा भी हो, ये आशिकी यों ही बनी रहे। शरद कुमार श्रीवास्तव

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