बुधवार, 21 दिसंबर 2016
शून्य की गणित
साथ में जब एक था
तो शून्य भी अनेक था
किसी के साथ रहने से ही
हर अंक पे अनेकानेक था
एक से थी उसकी ताकत
एक से था उसका विश्वास
एक ही से थी उसे मोहब्बत
जीवन पलों का था आभास
एक के जीवन से निकलते
शून्य फिर सिफर रह गया
जीवन के साथ का आंकड़ा
एक के जाने से बिखर गया
न रह गई अब वो ताकत
किसी से भी पंगा ले सके
शून्य की कहाँ अब हिम्मत
शिकस्त किसी को दे सके
किसी शून्य की ताकत फिर
किसी के साथ मिलने में है।
एक हो दो या कोई अंक हो
उसका वजूद सिर्फ जुडने में है
साथी, परिवार या समाज हो
जोड़कर बनाए नये समीकरण
शून्य स्वयं भी होगा मूल्यवान
अंक का भी होगा नवमूल्याकन
शून्य का एकाकी रहने का
कोई भी मतलब ही नहीं है
महाशून्य मे विलय होने से पूर्व
जुड़ जाय किसी से ये सही है
शरद कुमार श्रीवास्तव
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