ऊषा की नई किरण लेके
बसंत का मौसम आया
नव प्रभात के स्वागत से
दृग तृप्त हुए मन हर्षाया
विलुप्त हो गई सारी धुंध
पतझड़ का क्षण बीत गया
ऊषा की किरणें आने से
रात्रि प्रहर अब बीत गया
झांकते नव पल्लव तरु से
देख उन्हें मेरा मन हर्षाया
कोमल कोपलें सजी धजी
देख विटप मन शरमाया
तृण शिखरों पे चमक रहे
हैं हीरक कण शुभ्र-धवल
सुरभित मंद हवा बह रही
थिरकती कलिकाएं नवल
फैला हुआ है कलियों का
सौंदर्य, ये बसंत है आली
बह रही हवा दिगंतों तक
मधुर मदिर मादक वाली
हैं पत्ते भी पेडों पे झूम रहे
पा झोंके मस्त हवाओं के
निर्मल आकाश बिछा हुआ
स्वागत नई फिजाओं के
पिक सुक कोकिला भी तो
वृक्ष पे मधुर गीत सुनाते हैं
मधुमास के सब रंगों में
निज सुन्दर रंग मिलाते हैं
शरद कुमार श्रीवास्तव
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