2 मार्च 2014 को वीनापति मे प्रकाशित मेरी रचना
रात
( हाइकु लेखन शैली मे 17 वर्णों की माला मे रचित)
रात आती है
सुबह आने तक
रुक जाती है
मै चाहता हूँ
कभी रात नहीं हो
सुबह ही हो
ठंडी शीतल
केवल सुबह हो
अविरल हो
मन्द बयार
ताज़ी निर्मल धूप
खुशहाल सी
तुमने देखा
रात ठहर गई
एक भय से
मेरी इच्छित
कामनाओं से डर
इसे लगता
ये बात है तो
पूरी रात जागूँगा
स्पर्धा में ही
अच्छा ही होता
रात आती ही नहीं
किसी के पास
दीर्घ स्थायी
विरहाकुल काली
बदनुमा सी
शरद कुमार श्रीवास्तव
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