रात की कालिमा गहराने लगी है
मेरे ख्यालों से बास आने लगी है
चटख आबनूसी सा एक साया
मेरे एहसासों मे अब छाने लगा है
नींद तो आती नही है कमबख्त
तिमिर यहाँ छाया रहता हरवक्त
दर्द न फना होता है न मिटता है
बनकर नासूर सा देह मे रिसता है
इंतजार की चंद घड़ियाँ है साकी
टूटा पैमाना हूँ बिखरना है बाकी
जो वक्त साथ बिताया ऐ जिन्दगी
वह अब मेरा साथ नहीं दे पायेगा
शरद कुमार श्रीवास्तव
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