गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

निराशा


रात की कालिमा गहराने लगी है

मेरे ख्यालों से बास आने लगी है

चटख आबनूसी सा  एक साया

मेरे एहसासों मे अब छाने लगा है


नींद  तो आती नही है कमबख्त 

तिमिर यहाँ छाया रहता हरवक्त

दर्द न फना होता है न मिटता है  

बनकर नासूर सा देह मे रिसता है 


इंतजार की चंद घड़ियाँ है साकी

टूटा पैमाना हूँ बिखरना है बाकी

जो वक्त साथ बिताया ऐ जिन्दगी

वह अब मेरा साथ नहीं दे पायेगा




शरद कुमार श्रीवास्तव 


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