युग प्रणेता
चले अकेले
एक प्रण लेकर
कथा रचने
गढ़ने नये
इतिहास का पृष्ठ
स्वर्णिम युग
लोहे की छेनी
हथौड़ा साधारण
जन मानस
विचार उगे
अद्भुत अनुपम
सोने का मृग
ये मारीचिका
करती दिग भ्रान्त
भटका लक्ष्य
संभलकर
कोद॔ड उठाकर
आखेट कर
लिखो कहानी
जन मानस पर
फिर उठके
सीता हरण
नही हो फिर कभी
आजानबाहु
शरद कुमार श्रीवास्तव
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