बुधवार, 5 सितंबर 2018



आसमानो से शहद है बरसा
पास में रजनीगंधा है महका
एकान्त के राग भी हैं सुरीले
मदमाते हुए प्याले से रसीले

वेदना के सुर हैं गम के सारे
आये जैसे हों छू देश तुम्हारे
हृदय श्रृंखला लो खनक उठी
सब तरफ तुम्हारी महक उठी

हर्ष- विषाद के सब फीके रस
शेष रह गया यह जीवन  बस
 पूस माघ की ये रात अंधियारी
सुरभित पर मन मे याद तुम्हारी

यह मेरी बेसब्र मेरी बेचैन निगाहें
ताकती आस्मां से आती हुई राहें
कतरा कतरा ओस जब बरसता है
खुश्बुए गेसू को ये मन तरसता है

शरद कुमार श्रीवास्तव















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