शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

दीदार



समायी  रहती है तू मेरे  खयालों  मे, तेरे जलवों  की  बात होती  है
दिखाई  देती नहीं मुझको  फिर भी  , बन्द आखों मे  पास होती है।

 तुम तो  रहती हो मेरे  खयालों  मे, तेरे जलवों  की  बात होती  है खलिश मे जलता रहा उम्र भर यूं ही अब रिहाई की  बात होतीं  है

कोई  कब तक  जलेगा और तपिश मे भला तेरी  मोहब्बत के  लिए
 जख्मों पर रखने के  लिए तेरी नजर के एक फाहे  की बात होती  है

इबादत  नही है कोई जरिया कोई इल्म नही है  मुझे अब  इश्किया
झुकी जाती  है शर्म से नजरें , दीदारे- यार  मेरे दिल के पास होतीं है

शरद कुमार  श्रीवास्तव


  

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