शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023

नदी

बहती है नदिया कल कल छल छल

नियत प्रणय उर आल्हादित प्रति पल

शीर्ष शिखर से सघन वन मे चल चल  

 उदधि मिलन की कामना का धर बल


अवरोध अनेकों उसने भी थे झेले

हर मोड़पर गति ने थे पापड़  बेले

पर अब सब रुकावटें तोड़ बढ़ आई

अभीष्ट मिलन की चाह बढ़ चढ़ लाई


अवलम्ब नहीं आतुरता ताउम्र सारी

अभिसार है नदीश, लय उसकी सारी

शिशिर बसंत,आतप मे भी आगे बढ़ना

 वाष्प उपल जल उदधि तरंग गति सारी

 

 शरद कुमार श्रीवास्तव 

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