बुधवार, 23 अगस्त 2017

दीर्घ स्थाई शाम



अब यह शाम भी लम्बी  खिंची जाती है
 मुँह मे पडे चिंगंम जैसी चलती ही जाती है
पहले तो ऐसा होता ही नहीं था कभी भी
शाम तो  जल्दी-जल्दी ही सरक जाती थी

अब तो परछाइयाँ  भी लम्बी  खिंच गईं
अपने साथ  गहरा सन्नाटा  बिखेर गई
 पहले तो ऐसा  होता  ही नहीं था कभी भी
सरेशाम रात  की गोद  में  सो जाते थे

यह शाम की लम्बाई  और पसरा एकान्त
उबाऊ यात्रा  अंबारम्भ से अम्बरांत तक
सूरज के रथ में  जुते घोड़ों सा विश्राम हीन
अपनी काया को  सहेजे,करे रात का इंतजार

शरद कुमार  श्रीवास्तव 

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