अब यह शाम भी लम्बी खिंची जाती है
मुँह मे पडे चिंगंम जैसी चलती ही जाती है
पहले तो ऐसा होता ही नहीं था कभी भी
शाम तो जल्दी-जल्दी ही सरक जाती थी
अब तो परछाइयाँ भी लम्बी खिंच गईं
अपने साथ गहरा सन्नाटा बिखेर गई
पहले तो ऐसा होता ही नहीं था कभी भी
सरेशाम रात की गोद में सो जाते थे
यह शाम की लम्बाई और पसरा एकान्त
उबाऊ यात्रा अंबारम्भ से अम्बरांत तक
सूरज के रथ में जुते घोड़ों सा विश्राम हीन
अपनी काया को सहेजे,करे रात का इंतजार
शरद कुमार श्रीवास्तव
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