अनुभूति
ठहरे हुए जीवन मे भी तरंगें
अंतर ध्वनित कंपन से उठती
या जगाती हैं अंतस का कंपन
परिपूरक चेतना सी ध्वनित
ज्वार भाटा सी न हो तो भी
तरंगे तो उठती रहती हैं सदा
हवा के स्पर्श से विचलित हो
जीवन का एहसास दिलाती
कंपित, तरंगित अनुभूतियाँ
पाषाणों के पास भी तो है
भूगर्भ की निर्जीव शिलाओं की
अनुभूतियाँ ही लाती हैं भूदोलन
शरद कुमार श्रीवास्तव
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