ऐ जिन्दगी मैं तुझसे कितना प्यार करता हूँ
हर पल मै मरता हूँ और मर के फिर जी जाता हूँ
हर मुकाम पे साहिल का नजारा दीख पडता है
तैर कर खुद जिंदगी की मौज में गोते लगाता हूँ
जिन्दगी ही मौज है हर मौज मे नई जिन्दगी है
यह सोच के साहिल से जरा दूर से कतराता हूँ
यह इल्म है कि किनारे पे जब मै पहुंच जाऊंगा
जिन्दगी की रौनक मे फिर आने नहीं पाऊँगा
वो जो तैर कर पार हुए साहिल के उस तरफ
झांक सकते नही जिन्दगी में वापस इस तरफ
ख्वाहिश तमन्ना इच्छाएँ जोर देती हैं जीने को
इसीलिये शायद मैं जिंदगी में डूबता उतराता हूँ
शरद कुमार श्रीवास्तव
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