कण-कण में है भगवान् बात तुम हमरी मानो
मेरी भला क्या औकात आप भी खुद संधानो
घूम रहे थे इधर उधर अधर्म का झंडा फहराते
कहाँ कहाँ से कैसे कैसे छद्म रूप लिये बनाते
हर प्राणी है अधम, न मानेे वह ईश्वर को शक्ति
लोभ माया मे फंसा भूला वह प्रभु की ही भक्ति
करता रहा कुकर्म अपनी मौजमस्ती मे खोया
आयी जब आफत सर पे बुक्का फाड़ वो रोया
शरद कुमार श्रीवास्तव
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