रविवार, 18 अक्टूबर 2020

अवगुंठन अब खोल प्रिये निर्बाध निरंतर मिलें हिए




अवगुंठन अब खोल प्रिये

निर्बाध निरंतर मिलें हिए


सप्तपदी हो चुकी हमारी

कुछ नहीं दूरी अब रहे हिए

नूपुर की धुन हुई है मद्धिम 

कंकण भी अब खोल प्रिये 


लौ दीपक की हुई है मद्धिम 

गहन तिमिर रात्रि अवरोहित

अपने साजन संग डोल प्रिये

सासें सांसों संग घोल प्रिये


गायन हो तन मन के अंदर 

घुलें मिलें मन मस्त सचेतन 

तब होए मधुरात्रि मनोहर 

जब होए कल्लोल सुमधुर 


अवगुंठन अब खोल प्रिये

निर्बाध निरंतर मिलें हिए

जब तक हैं तन में सासें

प्रभु को नहीं छोड़ प्रिये







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