अवगुंठन अब खोल प्रिये
निर्बाध निरंतर मिलें हिए
सप्तपदी हो चुकी हमारी
कुछ नहीं दूरी अब रहे हिए
नूपुर की धुन हुई है मद्धिम
कंकण भी अब खोल प्रिये
लौ दीपक की हुई है मद्धिम
गहन तिमिर रात्रि अवरोहित
अपने साजन संग डोल प्रिये
सासें सांसों संग घोल प्रिये
गायन हो तन मन के अंदर
घुलें मिलें मन मस्त सचेतन
तब होए मधुरात्रि मनोहर
जब होए कल्लोल सुमधुर
अवगुंठन अब खोल प्रिये
निर्बाध निरंतर मिलें हिए
जब तक हैं तन में सासें
प्रभु को नहीं छोड़ प्रिये
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