बुधवार, 19 अगस्त 2020

बेड़ियाँ



बन्द थे दरवाजे उस दिन वो अमावस की रात थी
संक्रमण के अचानक फैलने वाली की वो बात थी 
हर गली हर मोड़ पर पसरा हुआ था घना सन्नाटा 
हर शक्स था सहमा सामने भविष्य था अज्ञात सा

बीते काल  के खम्बे शहतीरें कहते हैं ये कहानी
पहले भी खौफ़ झेलने की फैलती थी यही रवानी
चेचक कभी हैजा तो प्लेग से तंग थी जिंदगानी
मौज मे कभी नहीं रह पायी किसी की कहानी 

कम थीं जरूरतें मगर सबके शौक होते थे पूरे
कभी-कभी किसी के सपने भले रहते हों अधूरे 
भरोसा रख नियति पर बदलेंगे दिन जल्द सारे
करोना विषाणु है जैसे बाकी हैंऔर  विषाणु सारे


बात फकत मेरे अपने सब हैं मेरे खैरख्वाह
स्वाद पर अंकुश है कुछ आदतन लापरवाह
कुछ दूर मे दिख रही मंजिल पर तंग हैं राहें
चलना बा-मुश्किल राह जोहती बेसब्र निगाहें


उस पार से मेरे यार ने भेजा है ये पैगाम
अब तो बड़ी देर हो गई तकते सुबोशाम
प्यार बेबस और कुछ मै कर नहीं सकता
पलक भर तारों को देख बेबस मैं तकता

करने हैं यहाँ पर बाकी हैं बहुत अभी काम
वही रोक लेते हैं बेसब्री से नहीं हूँ अनजान
मुझे है यकीं फलक पे चांद निकलेगा कभी
इस खौफ़ इस डर से छुटकारा मिलेगा कभी


शरद कुमार श्रीवास्तव







कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें