बन्द थे दरवाजे उस दिन वो अमावस की रात थी
संक्रमण के अचानक फैलने वाली की वो बात थी
हर गली हर मोड़ पर पसरा हुआ था घना सन्नाटा
हर शक्स था सहमा सामने भविष्य था अज्ञात सा
बीते काल के खम्बे शहतीरें कहते हैं ये कहानी
पहले भी खौफ़ झेलने की फैलती थी यही रवानी
चेचक कभी हैजा तो प्लेग से तंग थी जिंदगानी
मौज मे कभी नहीं रह पायी किसी की कहानी
चेचक कभी हैजा तो प्लेग से तंग थी जिंदगानी
मौज मे कभी नहीं रह पायी किसी की कहानी
कम थीं जरूरतें मगर सबके शौक होते थे पूरे
कभी-कभी किसी के सपने भले रहते हों अधूरे
कभी-कभी किसी के सपने भले रहते हों अधूरे
भरोसा रख नियति पर बदलेंगे दिन जल्द सारे
करोना विषाणु है जैसे बाकी हैंऔर विषाणु सारे
करोना विषाणु है जैसे बाकी हैंऔर विषाणु सारे
बात फकत मेरे अपने सब हैं मेरे खैरख्वाह
स्वाद पर अंकुश है कुछ आदतन लापरवाह
कुछ दूर मे दिख रही मंजिल पर तंग हैं राहें
चलना बा-मुश्किल राह जोहती बेसब्र निगाहें
उस पार से मेरे यार ने भेजा है ये पैगाम
अब तो बड़ी देर हो गई तकते सुबोशाम
प्यार बेबस और कुछ मै कर नहीं सकता
पलक भर तारों को देख बेबस मैं तकता
करने हैं यहाँ पर बाकी हैं बहुत अभी काम
वही रोक लेते हैं बेसब्री से नहीं हूँ अनजान
मुझे है यकीं फलक पे चांद निकलेगा कभी
इस खौफ़ इस डर से छुटकारा मिलेगा कभी
शरद कुमार श्रीवास्तव
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