मृत हैं सब संवेदनाएं
धमनियां रिसती नहीं
अबला की चीखें अब
दुनिया ये सुनती नहीं
कठपुतली सब हैं यहाँ
रहता नहीं इन्सान है
चाभियों की संतान ये
यन्त्र सम पहचान है
क्रूरता करता है मानव
कुटिल हर्ष को जानता
कि बीमा से धन मिलेगा
निरीह कुंजरों को मारता
थी बेचारी गर्भवती वह
पेट में भ्रूण था पल रहा
उसे न था मालूम पापी
के मन मे क्या चल रहा
मौत लाया छल से वह
भर अनन्नास मे पटाखा
हथिनी को जबरन दिया
हर्षित हुआ कर धमाका
मुंह में जब फूटे पटाखे
तड़प पानी में कूदी वो
बचा न पाई स्वयं न ही
अजन्मी सन्तान ही को
दुष्टता की थी पराकाष्ठा
दुष्कर्म जन में पल रहा
हाय हर ओर ये हो रहा
तमाशा इंसा है जल रहा
धर्म के नाम पर ये दरिंदे
देश में देखो मर कट रहे
विश्व के पटल पे हैं लोग
दिनोंदिन तरक्की कर रहे
शरद कुमार श्रीवास्तव
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