मुद्दतें लग गईं उन्हें मनाने मे
कहाँ रह गए किस जमाने मे
मोहब्बतें कम न होती उनसे
बढ़ी है खलिश हर फसाने मे
बामुश्किल काबू किया दिल
बेकरारी मे सराबोर था दिल
नामुमकिन था भूलना उनको
हुआ नाशाद यह हमारा दिल
इस कदर मारा है बेवफाई ने
झकझोर दिया तेरे फसाने ने
उम्रदराज इश्किया अफसाना
बुतां इबादत का टकरा जाना
खैर जो होना है अब हो जाय
खुदाए इश्क रहबर हो जाए
दो रोज मयस्सर हैं शायद
इश्के- रब सराबोर हो जाए
शरद कुमार श्रीवास्तव
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