रविवार, 18 फ़रवरी 2018

दास्तान

मैं अंधेरे में रहा तुम अचानक खो गए
ढूंढ़ता हूं फिर रहा ख्वाब सारे सो गए
रात के लम्हे भी ख़ामोश सारे हो गए
चुप रहा मै मगर बदनाम तारे हो गए

चांदनी औ उल्फत मेरी यूं अचानक खो गई
दिन ख्यालों में बीता फिर अमावस हो गई
अब ना आएगी पलट, रात भर सोचा किया
मेरे तस्सवुर में ख्वाब से सारे नज़ारे हो गए

किसी तरह  कट रहा  जिंदगी का  ये सफर
चांद बस उम्मीद है जिसमें आएगी तू नजर
दूर जाना मुझ से तेरा अब सहा जाता नहीं
क्या कहूं कैसे कहूं मुझसे कहा जाता नहीं


शरद कुमार श्रीवास्तव


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