भ्रमर तुम गीत गाते प्रणय का राग सुनाते हो
मधुर गीतों को भर मदिर झंकार सुनाते हो
भरे रंग हर मौसम में ये उनकी ही कहानी है
बसंत जब रंग लाता तुम उसमे डूब जाते हो
बसंत में अनंग संगसंग तुम भी आये हो
फ़िज़ा मे है मस्ती जवानी खेतों में है छाई
नादान कलियाँ भी मदिर गीतों से हैं बौराई
छुपाते हो क्यों सनम से मिल केआये हो
उन्होंने तुमको भेजा है वे खुद नहीं आये
आना मुश्किल था भेजा मदन को क्यों
सारे तीर तरकश के हमपर छोड़ता रहता
नशा उससे सदा जेहन पर छाया सा रहता
सन्देशा ही सहारा है जिसे छुपाये जाते हो `
महा ज्ञानं से भरपूर संदेशा ले के आते हो
तेरा सनम सगुण है निर्गुण भी वही ही है
भला वो तुझसे दूर या तुझसे जुदा भी है
भ्रमर काले तुम तुम्हारा दिल भी है काला
प्रेम को समझेगा जो हो प्रेम में मतवाला
समेटो ज्ञान की पोथी हमें बस सनम लादो
वो मोहन अपना कृष्ण बंसी बज्जैया लादो
उसको बतलादो ये बस बिनती हमारी है
हमें न चैन मिलता है प्रीत की बीमारी है
भ्रमर जो रूप उद्धव का सखा महाज्ञानी हैं
उन्होंने भी ज्ञान पर जीत प्रेम की मानी है
शरद कुमार श्रीवास्तव
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