मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

एकान्त की मदहोशियां




भोर घिर आई छुप गयी रात है
वेदना के स्वर अब भी मुखरित
जाने ये कैसी जाने क्या बात है
थमी आखें, यादों की बारात है

ऊषा की लालिमा है चटख सी
रात रानी तसव्वुर मे है महकती 
काली घटा नयन में है बहकती
उदधि से उर मे उमड़े हालात है

रात का पल चपला सी लडी थी
ख्यालों में यादो की बूँदें  पडीं थी
कुछ ही देर  क्यों ठंडक पडी थी
उमस के पल के शुरू की घड़ी थी

रात्रि के आगोश में दफन दर्द सारे 
दो बूँद आब, फिर कोई भी पुकारे
रात की तन्हाईयाँ यूं खलती नहीं है 
सबों से तल्खियां मिटती भी नहीं हैं

तसव्वुर मे तुम न आओ या कोई भी
तल्खियां साथ हैं जरूरी न कोई भी
गमों से कोई साबका अपना नहीँ है
साथ एकान्त की मदहोशियां बड़ी हैं

शरद कुमार श्रीवास्तव

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