इस तपती धूप में
कोई भी साथ नहीं
सिर्फ मैं हूँ मेरा हमसफर
या फिर मेरी परछाईं
सी मेरी यादें
और
दूर तक पसरा है
एक अन्तहीन सन्नाटा
गर्म हवाओं के थपेड़ों को
बाकी सफर मे झेलता
मेरा नितांत एकाकीपन
लक्ष्यहीन, अदृश्य महापड़ाव तक
शरद कुमार श्रीवास्तव
कोई भी साथ नहीं
सिर्फ मैं हूँ मेरा हमसफर
या फिर मेरी परछाईं
सी मेरी यादें
और
दूर तक पसरा है
एक अन्तहीन सन्नाटा
गर्म हवाओं के थपेड़ों को
बाकी सफर मे झेलता
मेरा नितांत एकाकीपन
लक्ष्यहीन, अदृश्य महापड़ाव तक
शरद कुमार श्रीवास्तव
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