मंगलवार, 14 मई 2019

इस तपती धूप में
कोई भी साथ नहीं
सिर्फ मैं हूँ मेरा हमसफर
या फिर मेरी परछाईं
सी मेरी यादें

और
दूर तक पसरा है
एक अन्तहीन सन्नाटा
गर्म हवाओं के थपेड़ों को
बाकी सफर मे झेलता
मेरा नितांत एकाकीपन
लक्ष्यहीन, अदृश्य महापड़ाव तक

शरद कुमार श्रीवास्तव





कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें