आया बसन्त, नव पल्लव हैं आए तरु पर
ऐसे लगता तुम ही जैसे आये हो गिरधर,
पर्वत लगे पिघलने, बन कर जल निर्मल
जो नदियों की गोद में बहता है कलकल
कामदेव का राज खुशियाँ हरेक तरूपर
कुसुमित सुरभित विटप लहराते हैं सुंदर
सरसों फूल बिखेरें पीली आभा सुखकर
अनंगपुत्र तेरे ही वसन पहने हों मनहर
चटख रहीं कलियाँ कलियाँ रूप संजोये
जल कणिकाओं के हार तेरे लिए पिरोये
लेकर वसंत राग पेड़ों पर कोकिला बोले
मकरन्द लोलुप भ्रमर दल फूलों पे डोले
शरद कुमार श्रीवास्तव
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