शनिवार, 2 दिसंबर 2017

ओ बन्धु रे कुछ तो बोल


ओ बन्धु रे कुछ तो बोल
अपनी मन की गाठें खोल
डरा डरा  क्यों तू है बोल
ओ बन्धु रे कुछ तो बोल

दिग दिगान्त शान्त हुए
तू क्यों है दिग्भ्रांत प्रिये
समय की महिमा महान
यह काल बड़ा  बलवान

शाम गभीर बदली छाई
जाने रात कब घिर आई
रात होगी तो दिन होगा
यह बस तू मन में तोल

नवदिन का आगाज कर
नहीं रात से अब तू डर
ओढ़ के सो सपने प्यारे
स्वर्णिम से स्निग्ध न्यारे

अब बन्धु कुछ तो बोल
अपनी मन की गाठें खोल
डरा डरा  क्यों तू है बोल
ओ बन्धु रे कुछ तो बोल





1 टिप्पणी: